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हिंदी पंचांग 1969

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📿 व्रत और उपवास कैलेंडर 📍 PUNE

पूर्णिमा व्रत (१९६९)

Pune में सटीक पंचांग समय के अनुसार

📍 Pune
१८.५२०४° N  ·  ७३.८५६७° E
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व्रत का महत्व और जानकारी

पूर्णिमा व्रत हर महीने की पूर्णिमा तिथि (पूर्ण चंद्र) को रखा जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान सत्यनारायण (श्री हरि विष्णु) और चंद्र देव को समर्पित है। पूर्णिमा का चंद्रमा पूर्णता और शांति का प्रतीक है। इस दिन व्रत और सत्यनारायण कथा कराने से परिवार में सुख-समृद्धि, शांति और आरोग्यता का आगमन होता है।

✨ व्रत और पूजा का समय

पूर्णिमा व्रत सूर्योदय से प्रारंभ होता है। सत्यनारायण पूजा दोपहर या शाम को प्रदोष काल में करना सर्वोत्तम है। शाम को चंद्रोदय के समय अर्घ्य देकर व्रत खोलें।

📋 पूजा सामग्री
  • भगवान सत्यनारायण की मूर्ति या चित्र
  • पूजा के लिए चौकी और पीला कपड़ा
  • केले के पत्ते या आम के पत्ते (तोरण के लिए)
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी)
  • सूजी का हलवा/पंजीरी (सत्यनारायण का विशेष प्रसाद)
  • रोली, हल्दी, चंदन और अक्षत
  • ताजे फूल, दूर्वा और तुलसी पत्र
  • नारियल, पान के पत्ते और सुपारी
  • तांबे का कलश और शुद्ध जल
🪷 पूजा विधि
  1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान सत्यनारायण की स्थापना करें।
  3. भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं और चंदन-रोली का तिलक लगाएं।
  4. फूल, तुलसी दल और केले के पत्तों से वेदी को सजाएं।
  5. विशेष प्रसाद (पंजीरी/हलवा) और मौसमी फल अर्पित करें।
  6. श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।
  7. धूप-दीप जलाकर आरती करें और प्रसाद बांटे।
  8. शाम को पूर्ण चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलें।
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वार्षिक व्रत कैलेंडर तिथियां और समय

# तारीख / दिनांक वार महीना / तिथि शुभ मुहूर्त
इस वर्ष के लिए कोई तिथि नहीं मिली।
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भक्ति साहित्य (आरती, चालीसा, स्तोत्र व व्रत कथा)

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विष्णु आरती (जय जगदीश हरे)

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ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥...
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श्री विष्णु चालीसा (सम्पूर्ण ४० चौपाई)

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दोहा: विष्णु सुनिए विनय, सेवक की चितलाय। कीरत कुछ वर्णन करूँ, दीजै ज्ञान बताय॥...
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श्री सत्यनारायण व्रत कथा (सम्पूर्ण ५ अध्याय - स्कन्द पुराण रेवा खण्ड)

vrat katha
स्कन्द पुराण (रेवा खण्ड) आधारित सम्पूर्ण ५ अध्याय पारम्परिक कथा:\n\nअध्याय १ (महत्त्व एवं प्रसंग):\nएक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि ८८,००० ऋषियों ने महर्षि सूत जी से विनयपूर्वक पूछा— 'हे भगवन्! कलियुग में किस व्रत या तपस्या से मनुष्यादि को अल्प प्रयास से मनोवांछित फल and मोक्ष प्राप्त हो सकता है?' सूत जी ने कहा— 'हे ऋषियों! ऐसा ही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद जी ने भगवान श्रीमन नारायण से पूछा था। तब भगवान विष्णु ने स्वयं इस परम पवित्र श्री सत्यनारायण व्रत का विधान बताया था। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सत्यनारायण देव का पूजन करते हैं, वे धन-धान्य, सन्तान और सुख प्राप्त कर अंत में मोक्ष को प्राप्त होते हैं।'\n\nअध्याय २ (निर्धन ब्राह्मण एवं काष्ठ विक्रेता लकड़हारा):\nकाशी नगरी में एक परम धार्मिक किन्तु अति निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसकी दरिद्रता देखकर भगवान विष्णु ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उसे दर्शन दिए और कहा— 'हे ब्राह्मण! तुम सत्यनारायण देव का व्रत करो, जिससे तुम्हारे सब दुख दूर हो जाएँगे।' ब्राह्मण ने संकल्प लेकर अगले दिन विधि-विधान से व्रत एवं पूजन किया, जिससे वह अपार धन-धान्य से सम्पन्न हो गया। उसी समय एक प्यासा काष्ठ विक्रेता (लकड़हारा) वहाँ आया। उसने ब्राह्मण को पूजन करते देख व्रत का महात्म्य पूछा और स्वयं भी लकड़ियाँ बेचकर प्राप्त धन से व्रत करने का संकल्प लिया। सत्यनारायण देव की कृपा से उस लकड़हारे को लकड़ियों का दुगुना मूल्य मिला और वह भी सुखी-समृद्ध हो गया।\n\nअध्याय ३ (राजा उल्कामुख एवं साधु वैश्य की कथा):\nप्राचीन काल में उल्कामुख नाम के परम ज्ञानी राजा अपनी रानी भद्रशीला के साथ भद्रशीला नदी के तट पर सत्यनारायण व्रत कर रहे थे। उसी समय 'साधु' नाम का एक धनवान व्यापारी वहाँ आया और राजा से व्रत के विषय में पूछा। साधु वैश्य ने भी सन्तान प्राप्ति होने पर इस व्रत को करने का संकल्प लिया। कालान्तर में उसकी पत्नी लीलावती ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम कलावती रखा गया। किन्तु साधु वैश्य ने मोहवश कन्या के विवाह तक व्रत को टाल दिया। जब कलावती का विवाह कंचनपुर के एक योग्य वैश्य कुमार से हो गया, तब भी साधु अपना संकल्प भूल गया। इससे सत्यनारायण देव अप्रसन्न हो गए।\n\nअध्याय ४ (साधु वैश्य का संकट एवं मुक्ति):\nसाधु वैश्य अपने दामाद के साथ चंद्रकेतु राजा के रत्नसार नगर में व्यापार करने गया। भगवान की माया से राजा के महल में चोरी हुई और चोरों ने चुराए हुए रत्न साधु वैश्य की दुकान के पास छिपा दिए। राजा के सैनिकों ने साधु और उसके दामाद को चोर समझकर बंदी बना लिया और उनकी सारी धन-संपत्ति जब्त कर ली। इधर साधु के घर में भी चोरी हो गई और उसकी पत्नी व पुत्री कलावती भिक्षा माँगने पर विवश हो गईं। एक दिन कलावती ने एक मंदिर में सत्यनारायण व्रत होते देखा और घर आकर माता को बताया। लीलावती ने अपनी भूल स्वीकार की और भक्तिभाव से सत्यनारायण व्रत किया। भगवान ने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में आदेश दिया कि दोनों वैश्यों को मुक्त करो और उनका धन लौटाओ। राजा ने उन्हें धन-सम्मान के साथ विदा किया।\n\nअध्याय ५ (प्रसाद का अनादर एवं अन्तिम कल्याण):\nनाव से लौटते समय साधु वैश्य की परीक्षा लेने हेतु भगवान ने संन्यासी रूप में पूछा कि नाव में क्या है? साधु ने असत्य कहा कि केवल लता-पत्र हैं। भगवान के 'एवमस्तु' कहते ही नाव में रखी स्वर्ण-मुद्राएँ बेल-पत्रों में बदल गईं। साधु ने क्षमा माँगी तो भगवान ने पुनः धन लौटा दिया। घर पहुँचने पर कलावती ने पति के आगमन का समाचार सुना, किन्तु उतावली में भगवान का प्रसाद लिए बिना ही पति से मिलने चली गई। इससे भगवान रुष्ट हो गए और दामाद सहित नाव जल में डूब गई। साधु वैश्य को अपनी भूल का ज्ञान हुआ। कलावती ने लौटकर प्रसाद ग्रहण किया और प्रार्थना की, जिससे दामाद और नाव पुनः प्रकट हो गए। तदुपरांत पूरा परिवार जीवन भर सत्यनारायण व्रत करता रहा और अंत में बैकुंठ लोक को गया।...
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वट सावित्री / वट पूर्णिमा व्रत कथा (सम्पूर्ण महाभारत वन पर्व कथा)

vrat katha
महाभारत (वन पर्व) आधारित सम्पूर्ण सावित्री-सत्यवान कथा:\n\nमद्र देश के राजा अश्वपति परम ज्ञानी और धर्मात्मा थे, किन्तु उनकी कोई सन्तान नहीं थी। उन्होंने १८ वर्षों तक देवी सावित्री की कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक तेजस्वी पुत्री का वरदान दिया। पुत्री का नाम सावित्री रखा गया। जब सावित्री विवाह योग्य हुई, तो उसने साल्व देश के निर्वासित एवं अंध राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपना पति चुना।\n\nदेवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को चेतावनी दी कि सत्यवान सर्वगुण सम्पन्न है, किन्तु उसकी आयु केवल एक वर्ष शेष है। इसके बावजूद सावित्री अपने धर्म पर दृढ़ रही और सत्यवान से विवाह कर लिया। वह अपने सास-ससुर और पति की सेवा में तपोवन में रहने लगी।\n\nसत्यवान की मृत्यु के नियत दिन से तीन दिन पूर्व सावित्री ने 'त्रिरात्र' व्रत रखा। नियत दिन सत्यवान लकड़ियाँ काटने जंगल गया, तो सावित्री भी उसके साथ गई। वट वृक्ष (बरगद) के नीचे सत्यवान का सिर चकराया और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर सो गया। उसी समय साक्षात यमराज पाश लेकर प्रकट हुए और सत्यवान के जीवात्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए।\n\nसावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने उसे लौटने को कहा, किन्तु सावित्री ने पतिव्रत धर्म, निष्ठा और नीतिसंगत वचनों से यमराज को निरुत्तर कर दिया। यमराज ने प्रसन्न होकर सत्यवान के प्राणों को छोड़कर तीन वरदान माँगने को कहा। सावित्री ने पहले वरदान में अपने ससुर की दृष्टि और खोया हुआ राज्य माँगा, दूसरे वरदान में अपने पिता के लिए १०० पुत्र माँगे, और तीसरे वरदान में अपने लिए १०० यशस्वी पुत्रों का वर माँगा। यमराज ने 'एवमस्तु' कह दिया। तब सावित्री ने कहा— 'हे धर्मराज! बिना पति के मैं पुत्रवती कैसे हो सकती हूँ?' यमराज अपनी वचनबद्धता समझ गए और उन्होंने प्रसन्न होकर सत्यवान के प्राणों को पाश से मुक्त कर दिया।...
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पूजा विधि एवं नियम

सुबह सूर्योदय से लेकर शाम को चंद्र दर्शन तक उपवास रखें।
तामसिक भोजन, लहसुन, प्याज और मदिरा का सेवन वर्जित है।
फलाहार या साधारण सात्विक भोजन ग्रहण करें।
इस दिन गरीबों को दान देने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
— पवित्र मंत्र
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ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।

May all be happy. May all be free from illness.

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📅 कैलेंडर 🪷 त्योहार 🔮 राशिफल