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📖 भक्ति साहित्य व्रत कथा

श्री सत्यनारायण व्रत कथा (सम्पूर्ण ५ अध्याय - स्कन्द पुराण रेवा खण्ड)

श्री सत्यनारायण व्रत कथा (सम्पूर्ण ५ अध्याय - स्कन्द पुराण रेवा खण्ड)

स्कन्द पुराण (रेवा खण्ड) आधारित सम्पूर्ण ५ अध्याय पारम्परिक कथा:\n\nअध्याय १ (महत्त्व एवं प्रसंग):\nएक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि ८८,००० ऋषियों ने महर्षि सूत जी से विनयपूर्वक पूछा— 'हे भगवन्! कलियुग में किस व्रत या तपस्या से मनुष्यादि को अल्प प्रयास से मनोवांछित फल and मोक्ष प्राप्त हो सकता है?' सूत जी ने कहा— 'हे ऋषियों! ऐसा ही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद जी ने भगवान श्रीमन नारायण से पूछा था। तब भगवान विष्णु ने स्वयं इस परम पवित्र श्री सत्यनारायण व्रत का विधान बताया था। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सत्यनारायण देव का पूजन करते हैं, वे धन-धान्य, सन्तान और सुख प्राप्त कर अंत में मोक्ष को प्राप्त होते हैं।'\n\nअध्याय २ (निर्धन ब्राह्मण एवं काष्ठ विक्रेता लकड़हारा):\nकाशी नगरी में एक परम धार्मिक किन्तु अति निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसकी दरिद्रता देखकर भगवान विष्णु ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उसे दर्शन दिए और कहा— 'हे ब्राह्मण! तुम सत्यनारायण देव का व्रत करो, जिससे तुम्हारे सब दुख दूर हो जाएँगे।' ब्राह्मण ने संकल्प लेकर अगले दिन विधि-विधान से व्रत एवं पूजन किया, जिससे वह अपार धन-धान्य से सम्पन्न हो गया। उसी समय एक प्यासा काष्ठ विक्रेता (लकड़हारा) वहाँ आया। उसने ब्राह्मण को पूजन करते देख व्रत का महात्म्य पूछा और स्वयं भी लकड़ियाँ बेचकर प्राप्त धन से व्रत करने का संकल्प लिया। सत्यनारायण देव की कृपा से उस लकड़हारे को लकड़ियों का दुगुना मूल्य मिला और वह भी सुखी-समृद्ध हो गया।\n\nअध्याय ३ (राजा उल्कामुख एवं साधु वैश्य की कथा):\nप्राचीन काल में उल्कामुख नाम के परम ज्ञानी राजा अपनी रानी भद्रशीला के साथ भद्रशीला नदी के तट पर सत्यनारायण व्रत कर रहे थे। उसी समय 'साधु' नाम का एक धनवान व्यापारी वहाँ आया और राजा से व्रत के विषय में पूछा। साधु वैश्य ने भी सन्तान प्राप्ति होने पर इस व्रत को करने का संकल्प लिया। कालान्तर में उसकी पत्नी लीलावती ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम कलावती रखा गया। किन्तु साधु वैश्य ने मोहवश कन्या के विवाह तक व्रत को टाल दिया। जब कलावती का विवाह कंचनपुर के एक योग्य वैश्य कुमार से हो गया, तब भी साधु अपना संकल्प भूल गया। इससे सत्यनारायण देव अप्रसन्न हो गए।\n\nअध्याय ४ (साधु वैश्य का संकट एवं मुक्ति):\nसाधु वैश्य अपने दामाद के साथ चंद्रकेतु राजा के रत्नसार नगर में व्यापार करने गया। भगवान की माया से राजा के महल में चोरी हुई और चोरों ने चुराए हुए रत्न साधु वैश्य की दुकान के पास छिपा दिए। राजा के सैनिकों ने साधु और उसके दामाद को चोर समझकर बंदी बना लिया और उनकी सारी धन-संपत्ति जब्त कर ली। इधर साधु के घर में भी चोरी हो गई और उसकी पत्नी व पुत्री कलावती भिक्षा माँगने पर विवश हो गईं। एक दिन कलावती ने एक मंदिर में सत्यनारायण व्रत होते देखा और घर आकर माता को बताया। लीलावती ने अपनी भूल स्वीकार की और भक्तिभाव से सत्यनारायण व्रत किया। भगवान ने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में आदेश दिया कि दोनों वैश्यों को मुक्त करो और उनका धन लौटाओ। राजा ने उन्हें धन-सम्मान के साथ विदा किया।\n\nअध्याय ५ (प्रसाद का अनादर एवं अन्तिम कल्याण):\nनाव से लौटते समय साधु वैश्य की परीक्षा लेने हेतु भगवान ने संन्यासी रूप में पूछा कि नाव में क्या है? साधु ने असत्य कहा कि केवल लता-पत्र हैं। भगवान के 'एवमस्तु' कहते ही नाव में रखी स्वर्ण-मुद्राएँ बेल-पत्रों में बदल गईं। साधु ने क्षमा माँगी तो भगवान ने पुनः धन लौटा दिया। घर पहुँचने पर कलावती ने पति के आगमन का समाचार सुना, किन्तु उतावली में भगवान का प्रसाद लिए बिना ही पति से मिलने चली गई। इससे भगवान रुष्ट हो गए और दामाद सहित नाव जल में डूब गई। साधु वैश्य को अपनी भूल का ज्ञान हुआ। कलावती ने लौटकर प्रसाद ग्रहण किया और प्रार्थना की, जिससे दामाद और नाव पुनः प्रकट हो गए। तदुपरांत पूरा परिवार जीवन भर सत्यनारायण व्रत करता रहा और अंत में बैकुंठ लोक को गया।

॥ संपूर्णम् ॥

ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते॥
— श्री देवी मंत्र
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ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।

May all be happy. May all be free from illness.

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