भक्ति साहित्य
✦
व्रत कथा
वट सावित्री / वट पूर्णिमा व्रत कथा (सम्पूर्ण महाभारत वन पर्व कथा)
वट सावित्री / वट पूर्णिमा व्रत कथा (सम्पूर्ण महाभारत वन पर्व कथा)
महाभारत (वन पर्व) आधारित सम्पूर्ण सावित्री-सत्यवान कथा:\n\nमद्र देश के राजा अश्वपति परम ज्ञानी और धर्मात्मा थे, किन्तु उनकी कोई सन्तान नहीं थी। उन्होंने १८ वर्षों तक देवी सावित्री की कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक तेजस्वी पुत्री का वरदान दिया। पुत्री का नाम सावित्री रखा गया। जब सावित्री विवाह योग्य हुई, तो उसने साल्व देश के निर्वासित एवं अंध राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपना पति चुना।\n\nदेवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को चेतावनी दी कि सत्यवान सर्वगुण सम्पन्न है, किन्तु उसकी आयु केवल एक वर्ष शेष है। इसके बावजूद सावित्री अपने धर्म पर दृढ़ रही और सत्यवान से विवाह कर लिया। वह अपने सास-ससुर और पति की सेवा में तपोवन में रहने लगी।\n\nसत्यवान की मृत्यु के नियत दिन से तीन दिन पूर्व सावित्री ने 'त्रिरात्र' व्रत रखा। नियत दिन सत्यवान लकड़ियाँ काटने जंगल गया, तो सावित्री भी उसके साथ गई। वट वृक्ष (बरगद) के नीचे सत्यवान का सिर चकराया और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर सो गया। उसी समय साक्षात यमराज पाश लेकर प्रकट हुए और सत्यवान के जीवात्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए।\n\nसावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने उसे लौटने को कहा, किन्तु सावित्री ने पतिव्रत धर्म, निष्ठा और नीतिसंगत वचनों से यमराज को निरुत्तर कर दिया। यमराज ने प्रसन्न होकर सत्यवान के प्राणों को छोड़कर तीन वरदान माँगने को कहा। सावित्री ने पहले वरदान में अपने ससुर की दृष्टि और खोया हुआ राज्य माँगा, दूसरे वरदान में अपने पिता के लिए १०० पुत्र माँगे, और तीसरे वरदान में अपने लिए १०० यशस्वी पुत्रों का वर माँगा। यमराज ने 'एवमस्तु' कह दिया। तब सावित्री ने कहा— 'हे धर्मराज! बिना पति के मैं पुत्रवती कैसे हो सकती हूँ?' यमराज अपनी वचनबद्धता समझ गए और उन्होंने प्रसन्न होकर सत्यवान के प्राणों को पाश से मुक्त कर दिया।
✦
॥ संपूर्णम् ॥
🪔
✨
🪔
🌸
✨
🌺