भक्ति साहित्य
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व्रत कथा
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (सम्पूर्ण गणेश पुराण कथा)
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (सम्पूर्ण गणेश पुराण कथा)
गणेश पुराण आधारित पारम्परिक संकष्टी चतुर्थी कथा:\n\nप्राचीन काल में राजा हरिश्चन्द्र के राज्य में एक निर्धन कुम्हार रहता था। एक बार जब उसने मिट्टी के बर्तन बनाकर उन्हें पकाने के लिए आवा (भट्टी) में लगाया, तो कई दिनों तक अग्नि जलाने पर भी बर्तन पके नहीं। कुम्हार चिंताकुल होकर राजा के पास गया। राजा के पुरोहितों ने परामर्श दिया कि यदि किसी बालक की बलि आवा में दी जाए, तो बर्तन पक जाएँगे।\n\nउसी नगर में एक वृद्धा ब्राह्मणी रहती थी, जिसका एक ही पुत्र था। कुम्हार ने छल से उस बालक को प्राप्त कर लिया। बालक की माता संकष्टी चतुर्थी की परम भक्त थी। उसने अपने पुत्र को प्रस्थान समय गणेश जी का सिद्ध रक्षासूत्र (संकष्ट नाशक धागा) बाँध दिया और स्वयं निर्जल रहकर भगवान गणेश का ध्यान करने लगी।\n\nजब बालक को आवा में डालकर अग्नि प्रज्वलित की गई, तब माता के कठोर व्रत और गणेश जी की कृपा से प्रचंड अग्नि भी शीतल हो गई। अगले दिन जब कुम्हार ने आवा खोला, तो देखा कि सारे बर्तन पक चुके थे और बालक हँसता हुआ खेल रहा था। यह चमत्कार देखकर राजा हरिश्चन्द्र और समस्त प्रजा अचंभित रह गई। कुम्हार ने अपना अपराध स्वीकार किया। तब से संकष्टी चतुर्थी पर संकट निवारण हेतु चंद्रोदय के समय पूजा का विधान प्रचलित हुआ।
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॥ संपूर्णम् ॥
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