भक्ति साहित्य
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व्रत कथा
होलिका दहन एवं भक्त प्रह्लाद कथा (सम्पूर्ण विष्णु पुराण कथा)
होलिका दहन एवं भक्त प्रह्लाद कथा (सम्पूर्ण विष्णु पुराण कथा)
विष्णु पुराण आधारित सम्पूर्ण प्रह्लाद एवं होलिका कथा:\n\nप्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नामक महाबलशाली दैत्यराज ने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से अमरता का वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे न कोई मनुष्य मार सके न पशु, न अस्त्र से न शस्त्र से, न दिन में न रात में, न घर के भीतर न बाहर। इस घमंड में उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया और अपनी प्रजा को केवल उसकी पूजा करने का आदेश दिया।\n\nकिन्तु उसका अपना पुत्र प्रह्लाद भगवान श्रीमन नारायण का अनन्य भक्त था। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को राम-नाम जपने से रोकने के लिए अनेक यातनाएँ दीं। उसे ऊँचे पर्वतों से नीचे फेंका गया, विषैले सर्पों के कक्ष में छोड़ा गया, मत्त हाथियों के पैरों तले कुचलवाने का प्रयास किया गया और कालकूट विष पिलाया गया, किन्तु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ।\n\nअन्त में हिरण्यकशिपु की बहन 'होलिका' आगे आई, जिसे यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे भस्म नहीं कर सकती। होलिका अग्नि में बैठ गई। प्रह्लाद निरंतर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप करते रहे। भगवान विष्णु की माया से हवा का ऐसा झोंका चला कि होलिका का ओढ़ना उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गया। होलिका अग्नि में जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद सकुशल बाहर निकल आए।\n\nतत्पश्चात् सायंकाल भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार (आधा सिंह, आधा मनुष्य) धारण कर संध्या समय, घर की देहरी पर अपने तीक्ष्ण नखों से अत्याचारी हिरण्यकशिपु का वध कर दिया।
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॥ संपूर्णम् ॥
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